आइए आज हम जानते हैं जगन्नाथ जी के बारे में जगन्नाथ जी जितने आकर्षक हैं उतनी ही हर साल में निकाले जाने वाली शोभायात्रा भी आकर्षक है।
भगवान जगन्नाथ जितने अद्भुत और सुंदर हैं, उतने ही उनके चमत्कार और रहस्य अनोखे हैं। जगन्नाथ मंदिर भारत के चार पवित्र धामों में से एक है। वर्त्तमान मंदिर 800 वर्ष से अधिक प्राचीन है।
भगवान जगन्नाथ का प्रसिद्ध मंदिर उड़ीसा के पुरी में स्थित है जिसको भगवान जगन्नाथ धाम भी कहा जाता है। यह मंदिर भारत मे ही नहीं पूरे विश्व मे प्रसिद्ध है इस मंदिर के निर्माण मे तीन पीड़ियों का वक्त लगा था।
इस मंदिर की कई आश्चर्य जनक बाते है, भगवान जगन्नाथ मंदिर के चमत्कार भी कुछ कम नहीं और यहां की हर साल निकाले जाने वाली शोभायात्रा अनेकों श्रद्धालुओं भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
जैसा कि आप सभी जानते हैं भगवान जगन्नाथ और उनके मंदिर में ऐसे कई रहस्य छुपे हैं जिनका शोधन आज तक नहीं हो पाया है। वैसे ही उनकी एक रहस्य की बात यह भी है साल में निकाले जाने वाली शोभायात्रा।
आज मैं आपको अपने इस लेख में बताऊंगा कि भगवान जगन्नाथ जी के मंदिर में क्या-क्या रहस्य है?
क्यों भगवान की मूर्तियां अधूरी रह गई? क्यों हर साल भगवान की शोभायात्रा निकाली जाती है? मंदिर का निर्माण कैसे हुआ?

ये भी भगवान श्री कृष्ण की एक लीला ही है भगवान जगन्नाथ हमारे कृष्ण भगवान के ही अवतार हैं, जब माता अपनी सभी सहलियों को कृष्ण लीला सुना रहे थे, तो बहन सुभद्रा को कहा गया था की आप दरवाजे पर नजर रखना कही कृष्णा ओर बलराम ना आ जी परंतु कृष्णा लीला मे सुभद्रा इतनी खो गई की कृष्णा ओर बलराम कब आ गए पता ही नहीं चला ओर वो खुद भी अपनी लीलाओ को सुन कर मोहित हो गए।
बहन सुभद्रा, कृष्णा ओर बलराम तीनों इतने आश्चर्य मे थे लीलाओ को सुन कर की उनकी आखे बाहर निकाल आयी बाल खड़े हो गए ओर ऐसा मोहित रूप देख कर नरदमुनी वहा आ पहुचे ओर कहा प्रभु आपका इतना प्यार ओर मोहित रूप देख कर मे रह नहीं पाया ओर आपके दर्शन के लिए आ गया आप इस मोहित रूप मे कब अवतार ले रहे है तभी श्री कृष्णा भगवान ने नरदमुनी से कहा मे ये अवतार कलयुग मे लूँगा।
उसके बाद कलयुग मे मालवा के राजा इंद्रदयुम्न के सपने मे भगवान हरी के दर्शन हुए ओर इस मंदिर की स्थापना हुई मंदीर का निर्माण मालवा के राजा इंद्रदयुम्न ने कराया था, इनके पिता का नाम भारत और माता का नाम सुमति था.पौराणिक कथाओं के अनुसार मालवा नरेश इंद्रद्युम्न, जो भगवान विष्णु के भक्त थे, एक बार सपने में भगवान जगन्नाथ के दर्शन हुए थे.
सपने में भगवान ने राजा से नीलींचल पर्वत की गुफा में मूर्ति ढूंढने को कहा और मूर्ति का निर्माण लकड़ी से करवाने को कहा ओर कहा की ये लकड़ी समुन्द्र के तट पर मिलेगी उस से मूर्ति का निर्माण कराओ.
राजा को समुन्द्र के तट पर वो लकड़ी मिल गई जिसका जिक्र भगवान ने सपने के किया था, उस लकड़ी को लेकर राजा पूरी पहुचे, ओर इस लकड़ी से मूर्तिया बनाने को कहा उस राज्य के सभी मूर्तिकारों को बुलाया गया परंतु सभी नाकाम रहे भगवान जगन्नाथ जी की मूर्तिया बनाने मे,
राजा इंद्रदयुम्न परेशान थे केसे मूर्तियों का निर्माण किया जाए तभी राजा इंद्रदयुम्न पास के एक कबीले के लोगों के पास गए ओर कहा आप कृष्ण भक्त हो क्या आप मेरी मदत कर सकते हो भगवान जगन्नाथ बलभद्र ओर सुभद्रा की मूर्ति बनाने मे,
कबीले वालों ने कहा ठीक है लेकिन कोई भी उन मूर्तियों को आकार नहीं दे पा रह था न कबीले वाले ना राज्य के सर्वश्रेष्ट मूर्तिकार सभी हार मन कर बेठ गए ओर सभी भगवान से प्राथना करने लगे।
तभी एक वृद्ध मूर्तिकार आए ओर बोले मे इन मूर्तियों का आकार बना सकता हु, पर मेरी एक शर्त्त है, मे जब तक मूर्तियों को आकार दूंगा कोई भीकमरे का द्वार को नहीं खोलेगा नहीं तो मे उसी वक्त काम बंद कर दूंगा, अगर आप मेरी यह बाते मानो तो मे भगवान की मूर्तिया बना दूंगा।
राजा इंद्रदयुम्न ने उस मूर्तिकार की बातों को मान लिया ओर उन्हे कहा ठीक है, मूर्तिकार ने मूर्तिया बनाना चालू किया।
शुरुवात मे काम करने की आवाजे आती थी लेकिन कुछ दिनों बाद आवाजे आना बंद हो गई तो राजा इंद्रदयुम्न सोच मे पद गए की कही मूर्तिकार को कुछ हो तो नहीं गया इस चिंता मे राजा इंद्रदयुम्न उस बंद कमरे का द्वार खोल दिया ओर देखा तो वो वृद्ध मूर्तिकार गायब था शर्त के मुताबिक कमरे का गेट खुलने पर वृद्ध मूर्तिकारने काम रोक दिया ओर गायब हो गए।
वास्तव में वह बूढ़ा मूर्तिकार स्वयं विश्वकर्मा जी थे, जो भगवान विष्णु के आग्रह पर जगन्नाथ मंदिर में कृष्ण, बलराम और सुभद्रा की मूर्तियां बनाने धरती पर आए थे. ओर समय रहते चले भी गए।
इस मंदिर मे भगवान श्रीकृष्ण, जगन्नाथ रूप में विराजित है। साथ ही यहां उनके बड़े भाई बलराम (बलभद्र या बलदेव) और उनकी बहन देवी सुभद्रा की पूजा की जाती है।
भगवान जगन्नाथ जी की मूर्तियों को नीम की लकड़ी से बनाया गया है इन मूर्तियों को एक बंद कमरे मे बनाया गया था भगवान जगन्नाथ की आखे बड़ी-बड़ी ओर गोल है इन्हे चकड़ोला कहा जाता है बलभद्र ओर बहन देवी सुभद्रा की मूर्तियों को पथर मे तराशा गया है।
इस मंदिर के शिखर पर लगा ध्वज हमेशा हवा के विपरीत लहराता है, इस मंदीर मे किसी भी प्रकार की छाया नहीं बनती, मंदिर पर लगा सुदर्शन चक्र आप किसी भी दिशा से देखे आपको सीधा ही नजर आएगा, ओर यह भी आश्चर्य जनक बाते है की मंदिर मे लगे सुदर्शन चक्र का वजन लगभग 1 टन से ज्यादा है फिर भी बिना मशीन की सहायता से इतने सालों से ऊपर ही रखा हुआ है।

एक ओर खास बात इस मंदीर के ऊपर से कभी कोई भी पक्षी या विमान नहीं उड़ता।
कहा जाता है कि जगन्नाथ मंदिर में दुनिया की सबसे बड़ी रसोईघर है. इस रसोई मे 500 से ज्यादा रसोइ बनाने वाले और 300 से ज्यादा उनके सहयोगी कामचारी कार्य करते हैं. ओर तो ओर यहां चाहे अगर लाखों भक्त आ-जाएं यहा कभी भी प्रसाद कम नहीं पड़ता ओर शाम तक आते आते प्रसाद समाप्त भी हो जाता है वेस्ट नहीं होता ये भी यह का एक चमत्कार है
इस मन्दिर का वार्षिक रथ यात्रा उत्सव प्रसिद्ध है। इसमें मन्दिर के तीनों मुख्य देवता, भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भ्राता बलभद्र और भगिनी सुभद्रा तीनों, तीन अलग-अलग भव्य रथों में विराज-मान होकर यात्रा के लिए निकलते हैं।
रथ यात्रा भी दिलचसब होती है रथ यात्रा की तैयारी बेशाख मे शुक्ल तृतीय यानि मई मे रथ का विधिबद्ध तरीके से निर्माण किया जाता है।
भगवान जगन्नाथ भाई बलभद्र ओर बहन सुभद्रा तीनों के लिए अलग अलग रथ बनाए जाते है।
इस रथ की भी खासियत है की सबसे बड़ा रथ भगवान श्री जगन्नाथ जी का फिर भाई बलदेव फिर बहन सुभद्रा का रथ सबसे छोटा होता है लेकिन जब रथ यात्रा निकलती है तो सबसे आगे बहन सुभद्रा फिर भाई बलदेव ओर आखिर मे भगवान जगन्नाथ जी का रथ रहता है।
भगवान जगन्नाथ के रथ के बारे मे बताया जाता है इसमे 16 पहिये होते है तथा उचाई भी सबसे अधिक 13.5 मीटर होती है इस रथ मे कुल 832 लकड़ी के टुकड़ों का इस्तमल होता है जगन्नाथ रथ का आवरण लाल ओर पीला होता है वही बलभद्र के रथ मे 14 पहिये ओर उचाई 13.2 मीटर होती है ओर रथ का आवरण लाल ओर नीला होता है ओर सुभद्रा के रथ मे 12 पहिये होते है ओर उचाई 12.9 मीटर रथ का आवरण लाल ओर काला होता है।
रथ निर्माण के बाद मई ओर जून मे पूर्णिमा के स्नान के बाद रथ यात्रा की यात्रा की विधिबद्ध शुरुवात होती है, तीनों मूर्तियों को मंदिर से निकाल कर बाहर नहलाने मे लिए लाया जाता है मूर्तियों को 108 घड़ों के पानी से स्नान कराया जाता है फिर वहा के लोगों की माने तो भगवान ओर उनके भाई-बहन को सर्दी जुकाम हो जाता है, फिर उनका इलाज 15 दिन तक नियमित रूप से कराया जाता है, देखभाल की जाती है फिर वे स्वस्थ हो जाते है फिर होता है रथ यात्रा का सुभारंभ रास्ते मे सोने की झाड़ू से सफाई की जाती है फिर यात्रा प्रारंभ होती है ओर इस यात्रा मे लाखों लोग शामिल होते है यात्रा संध्या कल तक 3 किलोमीटर तक कुडीचाबारी तक जाती है फिर तीनों मूर्तियों को मोशी के मंदीर मे रखा जाता है 10 दिन तक वही रहते है फिर उसी हर्ष ओर उल्लास के साथ उन्हे वापस लाया जाता है, माना जाता है की इस यात्रा मे शामिल हो मात्र से ही जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाते है।
क्या आप भी कभी उड़ीसा के पुरी में स्थित इस भव्य ओर प्राचीन मंदीर मे भगवान जगन्नाथ ओर बलदेव साथ मे बहन सुभद्रा के दर्शन के लिए गए है अगर गए है तो जरूर comment करके बताए।
आपका धन्यवाद इस लेख को पड़ने ओर अपने दोस्तों को share करने के लिए।